Sunday, 23 February 2020

मज़लूम

हम इश्क़ से मज़लूम हैं, हैं इश्क़ से महरूम
ख़ता किसकी, कौन मुजरिम, हमें नहीं मालूम

संग-ओ-शीशा वही, वही तुम हो वही हम हैं
लाश सा वीराना वही, वही कौवों का हुजूम

बिछड़कर तुमसे भी, हम कहाँ अर्श पर पहुँचे !
न मिला ख़ुदा, न तुम मिले, न रूह को सुकून

हासिल नहीं अब भी, तुम्हारी यादों से निजात
फर्श-ए-क़फ़स पर, पड़े हैं टूटे हुए नाख़ून

मोहब्बत की मुसाफ़त में, मंज़िलें नहीं मिलतीं
हैं ज़ख़्मी कितने यहाँ, यहाँ कितने हुए मरहूम

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