मैं अदना क़तरा लोगों, दरिया का सज़ावार हुआ
सर्द सी मौजों की बाहें, इस जैसा मेरा दयार हुआ
इसी की जुस्तजू रही, बरसों मेरी आँखें को
बाद बरसों के हमनशीं, तेरे जौबन का दीदार हुआ
साग़र छलक जाए है, तेरी होठों की शराफ़त से
तेरी मयकशी में साक़ी, यहाँ लैल-ओ-नहार हुआ
दिल शादमा रहा, तेरे नशेमन की पनाह में
इस दुनिया मे रहकर, मैं दुनिया से बेज़ार हुआ
जो तेरे हाथ उठते हैं, मेरी ख़ातिर दुआओं में
मैं संगदिल तेरे प्यार में, धीरे धीरे 'निसार' हुआ
No comments:
Post a Comment