मेरे लफ़्ज़ों पर नहीं अगर तुझे ऐतबार
जलते पानी में तू अपने अक्स को निहार
जलते पानी में तू अपने अक्स को निहार
वादियों की फ़िज़ा पर लिख़कर हैं भेजे मैंने
कुछ ज़ाहिर, कुछ कहे, कुछ अनकहे इक़रार
कुछ ज़ाहिर, कुछ कहे, कुछ अनकहे इक़रार
तेरी हसीं सदा तो है अब आशना मेरी
बजते किलकारियों से वो तेरी आँखों के सितार
बजते किलकारियों से वो तेरी आँखों के सितार
एक अलग शख़्सियत है इस भीड़ में भी तेरी
जैसे उस झील की ख़ूबी वो चंचल चार चिनार
जैसे उस झील की ख़ूबी वो चंचल चार चिनार
तेरे मेरे दरम्यान होंगे मौसम बहोत लेकिन
तेरा वजूद ही है मेरे सावन का श्रृंगार
तेरा वजूद ही है मेरे सावन का श्रृंगार
Wow Vinod, very nice ����
ReplyDeleteशुक्रिया
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