Thursday, 31 May 2018

जिस्म

तेरी साँसों को मेरी साँसों में पिघल जाने दे
मेरे लबों को तेरे जिस्म पर फ़िसल जाने दे

कुतरते हुए नर्म तेरे गालों को
तेरे सीने में दबी आह को निकल जाने दे

सलीके से खेलकर तेरी ज़ुल्फों से
मेरे शोख़ मासूम इरादों को मचल जाने दे

नाभी पर बर्फ़ रखकर जहाँ चूमकर ठहरूँ
तेरी कमर को सर्द शिद्दत से थिरक जाने दे

मेरी मोहब्बत में तेरी तड़प की आग से
तेरे मोम से बदन को पिघल जाने दे

मदहोश कर दे तेरी रूह को सरसराहट से
यूँ मुझको तेरी रूह में उतर जाने दे

कुंदन से तेरे बदन की नायाब बनावट को
मेरे वस्ल की तपिश में निखर जाने दे

No comments:

Post a Comment