ऐ मशरूफ़ शख़्स तुझको अब परेशाँ न करेंगे ख़ुदको तोड़कर हर तरफ़ा तेरे निगेहबाँ न बनेंगे घोलकर ज़हर प्याले में एक तरफ़ा इश्क़ का तेरे ग़म के सोहबत में यूँ ही बेनिशाँ न मरेंगे
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