उस मुसाफ़िर को, इस बियाबां में एक राह मिली
तू मिला, तो उस सहरा को, समंदर में पनाह मिली
ख़ून-ए-जिगर निकाल कर, लिखता था पन्नों पर
हमदर्दी की दरकार थी, पर बस वाह वाह मिली
मेरे ज़िंदाँ-ए-ज़ात में, तू आई इस तरह, की
बाद स्याह रात के, बाद-ए-सबा-ओ-ज़ुहा मिली
संग-दिलों कि संग-ज़नी, और खूँटे से बँधा वो
मुक़द्दर के मुजरिम को, तेरे दर पर फ़लाह मिली
बेकसी नाम का, एक राहगीर था 'निसार', जिसे
उस ओर जाना था, और तुझसी मल्लाह मिली
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