सिवा बेख़ुदी के, उसका कोई और इस्तियारा न था
उस प्यारी क़फ़स से निजात, हमें गवारा न था
होठों पे ग़ज़ल और तसव्वुर, उसकी आँखों मे
अपने ही क़ातिल को, कभी हमनें यूँ सँवारा न था
हथेली में हरीफ़ों की, फ़ेहरिस्त रही दिनभर
तन्हा रातों में, फ़िर कोई आशना हमारा न था
हमारी बाद-ए-सबा के बग़ैर, उसमें बहार देख़कर
ज़हन में अब कोई और, हसरत-ए-नज़ारा न था
तर्क़-ए-ताल्लुकात उससे, आसाँ न था 'निसार'
पर भूल जाने के सिवा, अब कोई चारा न था
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