जाने वो कैसे बढ़ चले, कहकर कि राबता तोड़ लिया
हम वहीं रहगुज़र पर रह गए, जिसने जहाँ छोड़ दिया
एक ग़ुलाब था जफ़ाओं का, हक़ीक़त के बगीचे में
सो पास गए, ख़ुदको पाया और तना पकड़ मरोड़ दिया
याद-ए-क़फ़स के फ़िशार में, हैं चीख़ें किसकी मुसलसल !
क्यों रंगीन हैं तीलियाँ, यूँ किसने सर को फोड़ लिया !
ग़म-ए-जहाँ को बसा लिया, जहाँ सिर्फ़ ग़म-ए-इश्क़ था,
जो न छाँव मिली ज़ुल्फ़ों की, सो सारे आसमाँ को ओढ़ लिया
'निसार', सैराब था जो दामन, शबनम में उसकी वादों के
थामा जाम मयख़ाने में, और रफ़्ता रफ़्ता निचोड़ दिया
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