इख़लास-ओ-अहद-ए-वफ़ा, सब वहम है
वो तेरा सनम, कहाँ सिर्फ़ तेरा ही सनम है !
दिन अश्क़, और रात आँखों मे बीत जाती है
उस हरजाई का कहना है कि, बस यही रहम है
मासूम चहरे और आईने की दास्ताँ यूँ रही
वो वहाँ सँवर गए, और ये टूटकर ख़तम है
वो जो कल ज़ीस्त बोझिल हुई, ग़म-ए-हिज्र में
सुना है कुछ लिख गया और आज अदम है
वाकिफ़ हूँ, पल भर ख़ुशी की सज़ा से 'निसार'
न मुस्कुरा ऐ ज़िंदगी, तुझे ज़िंदगी की क़सम है
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