Sunday, 21 November 2021

ज़हमत

अपनी ज़हमत को, कुछ यूँ किया ज़ाया हमनें
कि तेरे रुख़सार को, पानी पे बनाया हमनें

वो हर बार जब भी, भरी ख़ून की बोतल
तमाम वक़्त तुझे, पहलू में बिठाया हमनें

इश्क़ में यूँ भी, हिसाब हमनें बराबर रक्खा
जितना चाहा, तुझे उतना ही सताया हमनें

आज फ़िर हाथ लगी, मरहूम माँ की तस्वीर
आज फ़िर आँखों से, एक दरिया बहाया हमनें 

'निसार' फ़िर ख़ुला, वुसअत-ए-ग़म हमपर
दिल के वीराने को फ़िर, पत्थरों से सजाया हमनें

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