Sunday, 21 November 2021

दरिया

कोई दरिया, जैसे समंदर में खो गया
तुझसे जो भी मिला, तेरा ही हो गया

होठों पर छाले, और आँखें झुलस चुकीं
सहरा में, तेरी साया-ए-शजर में सो गया

अज़ल से तपिश में, साहिल पे खड़ा हूँ
एक मौज आया मेहरबाँ, और पाँव धो गया

मेरे अश्कों के मोती, हथेली में समेटकर
अपने नाम के, हर्फ़ की, तस्बीह पिरो गया

ज़हन चाँद और आँखें, सूरज हैं जिसकी
मैं 'निसार' ऐ दोस्त, तेरा मुहाजिर हो गया

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