तुझसे मिलने भर से, हुए कितने रुस्वा हम
अब भी इंसाँ हैं, या शायद बन गए ख़ुदा हम
बहोत लोग हैं, बहोत सी बातें हुआ करती हैं
अब तू बता, सिलें किस किसकी ज़बाँ हम !
रास ही न आया, बज़्म-ए-रिंदाँ में कोई हमें
तेरे पास न आते, तो करते क्या वहाँ हम !
दर्द की राह से गुज़रे, तो ज़माना जाने
वो राह-ए-सुख़न, कि हुए कैसे आशना हम
वो पूछते हैं कौन है, जिसपे तू 'निसार' है !
नहीं जानते, किस ओर देखें तेरे सिवा हम
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