Sunday, 21 November 2021

पत्थर

पुर-सुकूँ दिल लाए थे, मुज़्तर सा हो गया
मंज़र से कशमकश में, मंज़र का हो गया
इस शीशे ने टूटना, यहाँ गवारा न किया
सो पत्थर के शहर में, पत्थर सा हो गया

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