महर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़ था, पर अदावतें न थीं
हमारे दरम्यान, शिक़वे होकर भी शिक़ायतें न थीं
याद करके रोना, और रो रो कर याद करना
जहाँ तक याद आता है, मेरी ऐसी रिवायतें न थीं
झूठ, फ़रेब, रम्ज़ और दुनिया भर के चोंचले
इस पाकीज़ा रिश्ते में, ज़माने की मिलावटें न थीं
अश्क़ देकर उसे, मेरे होठों पर मुस्कान रहे
मेरी क़िस्मत में, कभी ऐसी रियायतें न थीं
'निसार' याद आता है, तेरा इश्क़ लिख़ना मुझे
पर उनमें भी कहीं ऐसी, ग़मगीन इनायतें न थीं
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