मिलने के सही वक़्त का, करती रही इंतेज़ार वो
आग़ोश में मेरी तस्वीर लिए, आज रोइ ज़ार ज़ार वो
आँखों में लिखी थीं, उसकी बेकसी की हक़ीक़तें
आज फ़िर काम नहीं आए, उसके बहाने हज़ार वो
जिसकी यादों ने सारा दिन, मुझे रोने नहीं दिया
इन तन्हा अंधेर रातों में, बनता है ग़म-गुसार वो
ताज्जुब नहीं, मज़लूम अगर एतिमाद न करे
तमाम उम्र भोली सूरतों का, करता रहा ऐतबार वो
अपने हिस्से के सवाबों का, साया जितना भी था
ज़िंदगी की धूप में, सारे किये उसपर 'निसार' वो
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