Friday, 26 March 2021

जुगनू

उन्हें अलविदा कह, हम कुछ बुदबुदाते रह गए
लब सिल गए थे,उनके होंठ थरथराते रह गए

मुनासिब तो न था, यूँ राबते तोड़ना उनसे
ग़ैरत-ए-जज़्बात मगर हमें, आज़माते रह गए

अब बे-हिस-ओ-बेज़ार से, हम चल पड़े
ये तमाशबीन सारे हमको, बुलाते रह गए

उनसे, पहलू में बैठे सूरज की, शनाख़्त न हुई
सारी उम्र जुगनुओं से, मिलते मिलाते रह गए

उनके वादों के टूटने का, हिसाब क्या करना
उनका आना ऐसा था, कि आते ही रह गए

एक रोज़, उसे उजालों की दरकार आ पड़ी
अपना घर फूँक कर, हम मुस्कुराते रह गए

'निसार' ये कैसे लोग हैं, शजर उजाड़ देते हैं
और एक हम हैं, जो नशेमन बनाते रह गए

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