Monday, 5 February 2024

कारवाँ

वो कारवाँ मेरे दिल का कभी लुटा ही नहीं

मेरी बर्बादी के इर्द गिर्द हुजूम जुटा ही नहीं


यहाँ पानी की तरह बहाए हैं रिश्ते मैंने

मेरी गागर में वो एक सागर रुका ही नहीं


बिछ जाता कदमों में आसमाँ की तरह लेकिन

मैं भला उसे मनाता कैसे जो रूठा ही नहीं


नक़ली अज़ाब, फ़र्ज़ी दिलासे, झूठी उम्मीदें

ये दिल मक्कार भी है, सिर्फ झूठा ही नहीं


ऐ 'निसार' न कुरेद गुज़रे ज़माने की राख

ये वो शरर है जो अबतक बुझा ही नहीं

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