वो कारवाँ मेरे दिल का कभी लुटा ही नहीं
मेरी बर्बादी के इर्द गिर्द हुजूम जुटा ही नहीं
यहाँ पानी की तरह बहाए हैं रिश्ते मैंने
मेरी गागर में वो एक सागर रुका ही नहीं
बिछ जाता कदमों में आसमाँ की तरह लेकिन
मैं भला उसे मनाता कैसे जो रूठा ही नहीं
नक़ली अज़ाब, फ़र्ज़ी दिलासे, झूठी उम्मीदें
ये दिल मक्कार भी है, सिर्फ झूठा ही नहीं
ऐ 'निसार' न कुरेद गुज़रे ज़माने की राख
ये वो शरर है जो अबतक बुझा ही नहीं
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