Monday, 5 February 2024

इश्क़ और अश्क़

एक ओर इश्क़, दूजे ओर अश्क़ तौलोगी क्या ?

मैं लिखूँ ग़ज़लें, तुम कुछ नहीं बोलोगी क्या ?


सारा दिन चकोर, चाँद के इंतेज़ार में बैठी

बीती रात मेरी ख़ातिर, किवाड़ खोलोगी क्या ?


आँखों मे नींद और मेरे बदन में थकावट होगी

मुझे हर शाम अपनी गोद में, सोने दोगी क्या?


मैं वाकिफ़ हूँ तुम्हारे, श्रृंगार के लगाव से, लेकिन

बरसात में मेरे साथ, खुदको भिगा लोगी क्या?  


राह-ए-हस्ती के इस, जलते सफ़र में

मेरी मालकिन, मेरी अर्धांगिनी बनोगी क्या ?


मैं वो बशर हूँ 'निसार' , फ़रिश्ते करें जिसे सजदा

पल्लू में बाँधकर, मुझे अपना बना लोगी क्या ?

No comments:

Post a Comment