Monday, 5 February 2024

जुर्रत

शायद सदियों से मैंने, यही जुर्रत की है

कि हर जन्म में, तुमसे ही मोहब्बत की है


मेरी ज़िंदगी में, तुम्हारी रोशनी से पहले

ऐसा लगता था, ज़िंदगी ज़ुल्मत सी है


मैं आधा आया, जिया और आधा ही रहा

मेरे अधूरेपन का मदावा, तुम्हारी सोहबत ही है


तुमसे मिला, और मिलकर हार मान ली मैंने

मुझसे जीतना भी, तुम्हारी शफ़ाक़त ही है


मांग के सिंदूर से, पैरों की बिछिया तक

तुम्हारी सूरत, तुम्हारी सीरत मेरी मिल्कियत ही है


तुम्हारा ख़याल, मेरे तबस्सुम की वजह है

तुम्हारे इश्क़ ने देखो, मेरी कैसी हालत की है


मेरे मन की गगरी में, प्रेम का सागर है सजनी

कहूँ कैसे की, तुमसे कितनी उल्फ़त की है


मेरी पिहू, मेरी सजनी, ओ मेरी मेहरारू

हर तरह, तुम्हें अपना कहने की हिम्मत की है


हर जनम में, मेरी जानम तुम ही रहो

तू मेरी ज़िंदगी में खुशियों की हलावत सी है


वो ग़ज़ल सी सीरत, वो ग़ज़ाल सी आँखें

और भीगी ज़ुल्फ़ों नें, मुझपे इनायत की है


हर रोज़ हो प्यार , हर रोज़ मैं तुमपे 'निसार'

ऐसी दुआएँ, मैंने उस अनहद से की है

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