Thursday, 20 April 2023

बेक़दरा

मेरा ज़ख्म मेरे लिए, यूँ बेक़दरा हो गया
कि यार की नज़र भर से, फ़िर हरा हो गया

उससे नफ़रतों की कोशिश में, ये राबता
हर तसव्वुर के साथ, और भी गहरा हो गया

मेरी आवाज़ से, ऐतराज़ था जिसे
ख़ामोश चीखों से, मेरी बहरा हो गया

हालातों के समंदर में, लावे सा वो
यूँ जला, की सूरज सा ज़हरा हो गया

मेरी तक़दीर पे, यूँ 'निसार' था खुदा
कि जहाँ पाँव रखा, वहीं सहरा हो गया

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