Monday, 17 October 2022

रहगुज़र

समंदर और साहिल सा, याराना था जिससे
अश्क़ बहते नहीं थे, ग़म बेगाना था जिससे

मैं उसकी आँखों से आँखें, मिला नहीं रहा
आँखों में डूबकर, ख़ुदको मिलाना था जिससे

मंज़िलें अलग, रास्ते जुदा हो गए
सारी उम्र साथ बैठकर, बतियाना था जिससे

दिल में उसके नाम के, रंज पाले हुए हूँ 
सदा ख़ुश रहने का वादा, निभाना था जिससे

क्या इतनी दूर आ गए 'निसार', के लौट न सकेंगे ?
रहगुज़र पर मैंने, दामन छुड़ाया था जिससे

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