हाँ हैं कुछ जो माथे पर, चंदन सा सजाए जाते हैं
हैं कुछ जो सूखी टहनी सा, चूल्हों में जलाए जाते हैं
ठोकरों से हम पत्थर, टूट टूटकर ख़त्म हुए
कुछ शौक़ीनों की ख़ातिर, बेवजह सताए जाते हैं
हर फूल नहीं ख़ुशक़िस्मत, की भगवन के गले का हार बने
हैं कुछ ऐसे भी जो मसलकर, पैरों तले दबाए जाते हैं
दुहाई कि सुनवाई नहीं, न उसके घर इंसाफ़ है
बावला बनाकर हम, फ़िर तमाशा बनाए जाते हैं
मर क्यों न जाए 'निसार', अपनी स्याही में डूबकर
हर सितम पर ये शायर लोग, क्यों शोर मचाए जाते हैं !
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