तन्हाई में मुझपर, बहोत अख़्तियार करता है
पर सर-ए-महफ़िल, मेरे वजूद से इनकार करता है
अगर इतना बुरा हूँ, तो नाते तोड़ ले मुझसे
क्यों अहद-ए-वफ़ा, की मुझपे फुवार करता है
वो बात नहीं करता, ज़ालिम रस्में निभाता है
दोस्त बनकर, दोस्ती का कारोबार करता है
जो सबका हो शैदाई, वो किसीका नहीं होता
गले लगकर, लिए नश्तर, तार-तार करता है
क्योंकर बने 'निसार', पशेमानी का सबब तेरे
कह दे हौसला नहीं, क्यों बहाने हज़ार करता है !
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