चूम कलम को लबों नें, तेरी सीरत को बयाँ किया
पहलू में बिठाकर तुझे, अपना शेर सुना दिया
गाहे बगाहे डोर में, जो गिरह भी अगर पड़ी
तपती ज़मीं को बारिश सा, हमनें मना लिया
ज़रिया जो भी अख़्तियार कर, मंज़िल का
राह में यूँ निबाह हो, कि लगे सबकुछ कमा लिया
सितमगरों के सितम से, पथरा गया जो शख़्स
उसको ऐ दोस्त, तेरी नवाज़िशों नें रुला दिया
हथेली में हाथ रखकर, जो बंदिशों में नहीं रहा
वो दिल में रहा, और उसे आँखों में बसा लिया
वो आख़री मुलाक़ात को, जो आए दर पर मेरे
अश्कों से पाँव धोए, तबस्सुम से विदा किया
ग़म-ए-हिज्र जताना भी, ज़रूरी नहीं 'निसार'
ये भी तो कम नहीं, कि यादों में सजा लिया
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