Monday, 17 October 2022

बातें

वादा, वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या !
कच्चे धागे से ना-तुवाँ, इन नातों का क्या !

ग़ुलाब टूटा भी, तो गेसुओं में जा लगा
गुलों के मुहाफ़िज़, इन काँटों का क्या !

वो कहती है, कि हमारी दुनिया अलग है
बरसात की गवाही में, उन छातों का क्या !

मेरी आँखों में, तुझे सारे जवाब मिल गए
इन गीली आँखों से, बहते सवालातों का क्या !

'निसार' तेरे कहने पर, आँख बंद भी करले
पर आसेब से लैस, डरावनी रातों का क्या !

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