पास आकर, एक दूजे से लिपट जाते हैं
दो राहगीर, एक ही ठाँव में सिमट जाते हैं
उसकी ज़ुल्फ़ों से खेलकर ये हाथ मेरे,
उसके गालों तक, आके झिझक जाते हैं
शर्म-ओ-हया में उसके झुके चश्म जब,
उठते हैं तो, साग़र सा छलक जाते हैं
उसके होठों की सतह पर ये सर्द शबनम,
उसके कंधे के, पल्लू सा सरक जाते हैं
ये बारिश, फ़िज़ाएँ हैं जो उसपे 'निसार'
बस उसके बदन को छूकर, बहक जाते हैं
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