Monday, 29 October 2018

ये मुनासिब नहीं

आता नहीं है मुझे आँखों से बात करना
एक दूसरे में खोकर दिन को रात करना

तबस्सुम, हया और तेरा आँखें चुराकर तकना
मुनासिब नहीं सारे सितम एक साथ करना

घायल न हो जाऊँ तेरे नज़रों के वार से
अपने दीवाने पर बस इतनी एहतियात करना

है मोहब्बत अगर तो दे दिल में जगह मुझे
मेरे ख़ास शौकों में नहीं है बेबात मरना

इश्क़ है तो हो जज़्बा सनम में जज़्ब होने का
इस दिल्लगी में होगा ग़म-ए-ज़ात वरना

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