Tuesday, 23 October 2018

क़ब्र

कबतक मेरे दर्द पे मुस्कुराएँगे वो !
जी भर गया या और भी रुलाएँगे वो !

उनसे कह दो की वक़्त है मना लें मुझे
या मेरे जनाज़े पर आकर मनाएँगे वो !

मुझे मिली मोहलत अब ख़त्म हो रही है
क्या मुझसे मिलने का वादा निभाएँगे वो !

वादा किया है मौत के फ़रिशतों नें मुझसे
वहाँ मेरी मोहब्बत से मुझको मिलाएँगे वो ।

होंठ शायर के बिना उनके अब सूख रहे हैं
अपनी मौजूदगी से ग़ज़ल किसकी सजाएँगे वो !

ज़िंदा रहते तो न नसीब हुई हमदर्दी उनकी
शायद मेरी क़ब्र पर दो आँसू बहाएँगे वो ।

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