Tuesday, 23 October 2018

गुलाबी हुस्न

आज ग़ुलाबी हुस्न का निखरना क्या कहिये !
काजल का पलकों में बिखरना क्या कहिये !

गुलमोहर है तू शोख़ गुलशन का मेरे
उसपर चंदन सा तेरा महकना क्या कहिये !

छुआ न हो जिसे पाक़ शबनम ने कभी
आँखें चुराकर उसका सिमटना क्या कहिये !

ली हैं क़समें शराफ़त की मैंने बहोत लेकिन
तुझे देख नीयत का बहकना क्या कहिये !

क़ाफ़िला चाहतों का बस चला है अभी अभी
जवाँ दिलों से आहों का निकलना क्या कहिये !

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