मेरे ख़ुदा की तू ज़ाती मोहब्बत है
इनाम ख़ास मेरा ये तेरी सोहबत है
सामने रख़कर तुझे लिखूँ तुझी को
सजे ग़ज़ल ये अगर तेरी इजाज़त है
पिघल गया जिस हाथ की छुवन पर
मेरे पत्थर दिल पर ये तेरी लिखावट है
रखा जो यौवन संभाले बरसों से तूने
हैरत नहीं माशूक़ ये तेरी हिफ़ाज़त है
नशा उतरा पर ख़ुमारी उतरती नहीं
तेरे आघोष में रहकर की तेरी इबादत है
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