हमारे दर्द की तहरीर तो लफ़्ज़ों के परे है उसकी उल्फ़त ने बक्शे ज़ख़्म अभी हरे हैं क़ब्र में दफ़नाओ नहीं किताबों में उतारो हमें हम अपनी मोहब्बत की कहानी में मरे हैं
No comments:
Post a Comment