"सबब क्या हो सकता है, किसीके यूँ टूटने का ? सूरत-ए-यार पर लिखी, लकीरों के रूठने का ?" बस एक दफ़ा ख़बर लेकर, मुह मोड़ लिया हमसे हम इंतज़ार करते रहे, उनके दोबारा पूछने का
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