वो बैठे हैं शिक़स्ता, दयार-ए-यार में उम्मीद की चादर लिए, हैं मज़ार में क़ासिद-ए-यार, आया है पैग़ाम लेकर "उसे जुस्तजू ग़ैर की,जिसके तू इंतज़ार में"
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