जिसे सोचे बग़ैर, नहीं रह पाता हूँ मैं
क्या उसके ख़यालों में भी, कभी आता हूँ मैं !
तेरी आँखों नें कभी, मेरी राह नहीं देखी
ऐ बेख़बर, अब न पूछ कहाँ रह जाता हूँ मैं
कहीं दूर छोड़ आया, तेरी सोहबत को मैं
लोगों को भीड़ में भी, तन्हा नज़र आता हूँ मैं
नज़रें ग़मज़दा हो जाती हैं, तेरी याद में
सारी रस्में उल्फ़त की, अब भी निभाता हूँ मैं
फ़िराक़-ए-यार में, ख़ुदका कद्रदान हो गया
हर रोज़, थोड़ा थोड़ा ख़ुदको कमाता हूँ मैं
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