Tuesday, 24 September 2019

शिरक़त

सँवरती रोज़ हो, तो शिरक़त-ए-बाज़ार भी करो
तबस्सुम-ओ-हया से लैस,नज़रें चार भी करो
आरज़ू-ए-ज़हर-ए-हुस्न-ओ-शबाब मुझे भी है
तुम थोड़ा इश्क़, थोड़ा अर्ज़-ओ-इसरार भी करो

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