सँवरती रोज़ हो, तो शिरक़त-ए-बाज़ार भी करो तबस्सुम-ओ-हया से लैस,नज़रें चार भी करो आरज़ू-ए-ज़हर-ए-हुस्न-ओ-शबाब मुझे भी है तुम थोड़ा इश्क़, थोड़ा अर्ज़-ओ-इसरार भी करो
No comments:
Post a Comment