Tuesday, 24 September 2019

पत्थर

वाइज़ के हाथों अबतक, लुटते रहे
मोहब्बत के नाम पर, पत्थर पूजते रहे
सुनें सदा-ए-दिल, या बिखर जाएँ टूटकर
इसी जद्दोजहद में, शब-ओ-रोज़ झूझते रहे
तुझसे आज भी, ऐ सितमगर, रूठा नहीं जाता
ख़ामख़ा, कभी ख़ुदा, कभी ख़ुदसे रूठते रहे
चला गया बहोत दूर, कुछ बताए बग़ैर
हम तन्हाइयों से, उसका पता, पूछते रहे
ऐ इश्क़ की मूरत, तुझे बनाने में
हम रोज़, थोड़ा थोड़ा, टूटते रहे

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