मंज़िल न रही, फ़िर कारवाँ का बहाना न रहा
लुटे मुसाफ़िर का, कहीं और ठिकाना न रहा
उसकी महफ़िल में, वफ़ाओं का हिसाब था
मेरे ग़मों का, मगर कोई पैमाना न रहा
ख़ाली कर गई, सभी अहसासों से वो मुझे
इस घर में, फ़िर किसी का आना जाना न रहा
लिखे क़िस्से कई, नम पलकों की स्याही से
कहने को मगर, अंत में कोई फ़साना न रहा
मुझे उसकी, और उसे ज़माने की कशिश थी
मैं उसका नहीं, और मेरा ज़माना न रहा
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