ऐ, गुनाह-ए-इश्क़ के, इक़रार से मुकरने वाले नज़रें झुकाकर, मेरे पहलू से गुज़रने वाले सादगी ही, तेरा असल श्रृंगार है, पगली ! पलकों पे सुलाकर, मेरे ख़्वाब में सँवरने वाले
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