हुई मुद्दत, आईने में उसका चहरा देखे
अपनी आँखों में, उसके अक्स का पहरा देखे
वो नदी बनी, मैं राह का पत्थर न हुआ
मुझे गवारा न था, लोग उसे ठहरा देखें
असल तह, मल्लाह को मिलती नहीं कभी
दरिया-ए-यार में, वो कितना भी गहरा देखे
गिला नहीं, के उसे वीराने पसंद नहीं मेरे
वो सावन की आदी, क्यों भला सहरा देखे
शब को, सहर से एक इल्तिजा ज़रूर है
वो दोबारा उसे, अपने लिए महरा देखे
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