अगर तुझे न पढ़ सका, तो जाहिल ज़रूर हूँ
थोड़ा सही, तेरे जलवों के क़ाबिल ज़रूर हूँ
वो जो भीड़ उमड़ती है, तेरे दीदार को
उस लम्बी क़तार में, मैं भी शामिल ज़रूर हूँ
फ़िदरत तेरी है, सभी को इश्क़ नवाज़ना
आँखों में बसी चाह, और आमिल ज़रूर हूँ
तेरे जिस्म की आग में, भीगा क्या एक दफ़ा
लहरों की राह में खड़ा, साहिल ज़रूर हूँ
कोई आया शहर में, और ग़ज़लें सुना गया
तेरी मोहब्बत बाँटता, मैं वो राहिल ज़रूर हूँ
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