हाँ ज़्यादा माँग रहा तुझसे, मेरे ख़ुदा मुझसे ख़फ़ा न हो
तुझे चाहने का गुनाह किया, तुझे चाहने की सज़ा न हो
वो लकीरें तेरे जिस्म पर, कर्ज़दार हैं मेरी हथेली की
तेरा बदन वो कुछ कहे नहीं, जिसमें मेरी रज़ा न हो
दिलकश तेरी शामें, जो पिरोए हैं तूने ख़्वाब में
ख़ाली तेरा दामन रहे, वो रस्म कभी अदा न हो
नग़मों में मेरे सदा तेरी, मेरी हार थी तेरी दुआओं में
मुझे रोता छोड़ जाने वाले, तुझे खुशियाँ कभी बदा न हों
अश्कों के शबनम लेकर,दिए काँटे मुझे नसीब में
तुझे सहरा की धूल मिले, वहाँ तेरा कोई सगा न हो
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