Friday, 27 July 2018

ज़रूर

तू पढ़ न पढ़ मैं लिखुंगा ज़रूर
तू कह तो सही मैं सुनूंगा ज़रूर

निभा सके न तू शायद वादा तेरा
तेरे इंतज़ार में मैं रुकूंगा ज़रूर

तू तय तो कर मेरे अश्कों की क़ीमत
मुझे तेरी क़सम मैं बिकुंगा ज़रूर

हुआ रूबरू अगर मैं ख़ुदा से कभी
तुझे दोबारा ऐ सनम मैं मांगूंगा ज़रूर

तलाश हो कभी तुझे बावफ़ाओं की
मेरी आँखों में देख मैं दिखूंगा ज़रूर

है ये मर्ज़ी तेरी तू भूल जाए मुझे
लेकिन ज़हन में तेरे मैं रहूंगा ज़रूर

हम यहाँ न मिल सके तो रुसवाई कैसी!
इस ज़िंदगी के परे मैं मिलूंगा ज़रूर

ख़ुदा सुने न मेरी तो न सही दिलबर
तुझसे शिकाक़त तेरी मैं करूँगा ज़रूर

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