सहर की शबनम में तेरा चहरा पाया है तेरी अंजुमन में जवाँ शाख़ों का पहरा पाया है हैं जुस्तजू में क़ुदरत की ठंडी आहें मुसलसल तेरी आहट से मैंने वक़्त को ठहरा पाया है
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