एक रोज़ मेरा यार मिल गया मुझे
बिन कहे बहुत कुछ कह गया मुझे
"होंगे न जुदा कभी" ये कहता था मगर
अनजाने ही उस शाम सच कह गया मुझे
रुक गया कुछ रोज़ मैं भी कूह-ए-यार में
नशा उसके शराब का सर चढ़ गया मुझे
आख़िर कबतक गवारा करता वो गुनाह मेरे
तंग आकर एक रात बेदख़ल कर गया मुझे
दिलदार यार नें माफ़ कर दिया लेकिन
न चाहकर भी दिल से वो बाहर कर गया मुझे
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