एक दूजे की ओर फ़र्ज़ अपना निभाया हमनें अपने नसीब को न जाने कितना सताया हमनें वक़्त ने ख़ुशी के बख्शे मौके बहोत लेकिन आख़िर एक दूसरे को ही कितना रुलाया हमनें
No comments:
Post a Comment