आँखें बंद करता हूँ, तो याद आती है
अकेला होता हूँ, तो यहाँ रह रहकर
तुम बिन जीता हूँ, तो याद आती हैं
मरता था आरज़ू में, मरने की
अब तुम पर मरता हूँ, तो याद आती है
एक रोज़ बैठे थे, नाव पे हम दोनों
अब नाव देखता हूँ, तो याद आती है
कई शामें गुज़री हैं,तेरे साए में 'निसार'
दरख़्त की छाँव देखता हूँ, तो याद आती है
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