हूँ गुनहगार मैं तेरा, जो चाहे सज़ा दे
ख़ुदसे जुदा न कर, हाँ सूली चढ़ा दे
वीराँ वादियों में, तेरा यूँ खिलकर निकलना
नम आंखों से, मुस्कुराने की मुझे भी अदा दे
नाचीज़ को तेरे नाम के, ज़ख्म अज़ीज़ थे
बहते लहू को, मेरे वफ़ा के, किस्से सुना दे
वो उल्फ़त भरी तुझसे, नज़र न मिल सकी
साथ लड़ने, तेरी ख़ातिर, मरने की रज़ा दे
न चाहिए, सिवा इसके, मुझे कुछ 'ख़लीसी'
पल भर तू, मेरी लाश पर आँसू बहा दे
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