ये मोजज़ा, शब-ए-वस्ल पे, हुआ न करे भरे जहाँ में, कोई सहर की, दुआ न करे शर्म से मर जाती हूँ, जिसकी नज़र भर से वो अक्सर पास तो आए, मगर छुआ न करे
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