Monday, 5 November 2018

नगीना

तेरी ज़िंदगी में तारीख़ सा गुज़र जाऊँगा
तय नहीं, शायद इज़हार से मुकर जाऊँगा

ये दिल है मोतियों की माला सा नाज़ुक
तेरी हथेली की पनाह में बिखर जाऊँगा

आ बैठें किसी बगीचे में बेफ़िक्र होकर
दिलों का कुंभ नहीं ये जो बिछड़ जाऊँगा

खड़ी होकर नीचे से बस आवज़ तू देना
मैं अपने क़िले के ज़ीने से उतर जाऊँगा

मुझसे दूर होने की तू झूठी कोशिश न कर
मैं संगदिल हूँ लेकिन यहाँ सिहर जाऊँगा

तू घटा बनके जिधर चाहे बरस जाए
मैं तेरे साए की तलाश में उधर जाऊँगा

सिर्फ़ हाथ नहीं प्यार से भी बना मुझको
तेरे बालों का जूड़ा नहीं जो बिगड़ जाऊँगा

तू मेरी अंगूठी का वो नायाब नगीना है
जिसे चख कर किसी रोज़ मैं मर जाऊँगा

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